जब कभी तूलिकाओं को हम पलटते हैं ,

हमें शब्द लिखित किताबों की याद आती है ,

तूलिकाओं में किन्ही रंगों की कमी है क्या ?

फिर से हमें बेरंग पन्नों पर छपी हुई लेखनी याद आती है ,

अभी सार्थक निरर्थक की बात भी नहीं ,

फिर से हमें ज्वलंत मुद्दों की कहानी याद आती है ,

जब कभी तूलिकाओं को हम पलटते हैं ,

हमें शब्द लिखित किताबों की याद आती है ……….

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