ख्यालोंं ,ख्यालोंं में…..

ख्यालों,ख्यालों मेंं ख्याल सजाती है,
बरखा को दिन राय बुलाती है,
सतरंगी सपनों की ओढनी ओढेे,
रंगों से सराबोर वो लडकी परी बन जाती है,
जब फिर से कविताएं लिखने लग जाती है,
ख्यालोंं खयालों मेंं..........!!!!!!!
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खोया सा ख़्वाब

इन बैचैनीयों को करार आता है,

तेरा नाम लेके ये ख़्याल आता है…

खुद से खुद को चुरा लूँ मैं ,

कोई खोया हुआ सा ख़्वाब बड़ी तरकीबों से हमने इन पलकों पे सजाया है,

चलो अब मान भी लो के मेरी सूरत मेंं ,तुम्हें भी इन अभिव्यंजनाओं का अभिसार मिल जाता है,

किन्हीं आशाओं से ओत् प्रोत कोई प्यारा सा सितारा झिलमिलाता है,

मुझसे मिलने बादलों की ओट से चाँद नई साजिशें बिछाता  है,

देखती रहती हूँ मैं टकटकी लगाए,

कल्पनाओं का दौर चलता ही रहता है के गुस्ताख  हवाओं का शोर इन आँखों को जगाता है,

फिर से हकीकत का वाकया मुझे खामोश कर जाता है,

पक्तियाँ….

जिंदगी की बानगी, शहर दर शहर क्यूँ बिखरते हैं लोग, अब तो रहमो करम को तरसते हैं लोग, किन निगाहोंं के ख़्यालों,की कोई कोशिश हुई, अब तो कमोबेश ही कुछ बात भी करते हैंं लोग…..!!!!… स्रोत: | About my thoug…

स्रोत: पक्तियाँ….

पक्तियाँ….

जिंदगी की बानगी, शहर दर शहर क्यूँ बिखरते हैं लोग, अब तो रहमो करम को तरसते हैं लोग, किन निगाहोंं के ख़्यालों,की कोई कोशिश हुई, अब तो कमोबेश ही कुछ बात भी करते हैंं लोग…..!!!!…

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कल्पना और कविता
यूँ ही बैठे हम साज सजाने लगे। कल्पनाओं मे डूबे और यूँ ही मुस्कुराने लगे