जब कभी तूलिकाओं को हम पलटते हैं ,

हमें शब्द लिखित किताबों की याद आती है ,

तूलिकाओं में किन्ही रंगों की कमी है क्या ?

फिर से हमें बेरंग पन्नों पर छपी हुई लेखनी याद आती है ,

अभी सार्थक निरर्थक की बात भी नहीं ,

फिर से हमें ज्वलंत मुद्दों की कहानी याद आती है ,

जब कभी तूलिकाओं को हम पलटते हैं ,

हमें शब्द लिखित किताबों की याद आती है ……….

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सीने में दहक ,फिर भी आँखों में चमक लिए तुम आगे बढ़ना ,

पैरों में कांटें चुभे , तीक्ष्ण तीरों सी बाते सुनके भी तुम आगे बढ़ना ,

कभी तेज़ धूप से जलता हो तन मन ,

तुम आशाओं की छावं लिए बस चलते रहना ,

कभी गिरके सँभालने में वक़्त जो लगे ,

तुम खुद के दायरों को कभी सीमित न करना ,

आज इस अँधेरे का डर क्यूँ है तुम्हें ?तुम सिर्फ जुग्नूओं की रौशनी को चाँद के माफिक समझना ,

हौसला टूटे न कभी ये सोच लो तुम भी ,अपनी कोशिशों को कभी जाया न करना ,

आज मायूस क्यूँ हो तुम ?किसलिए दुश्वारियों का डर तुम्हें ?

मेहनत  के पुलिंदों और खुद पर विश्वास का मिलेगा प्रतिफल तुम्हें ,

सीने में दहक फिर भी आँखों में चमक लिए तुम आगे बढ़ना