बरखा आई है….🌦🌦

हवा के साथ टिप-टिप बौछारें लाई है, बरखा आई है।🌦🌦🌦🌦🌦

पेड़ों के पत्तीयों की सरसराहट मन को भाई है, बरखा आई है।

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दिन दुपहरी धुली धुली सी ,नदियों की धारा फिर से रंग लाई है।

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फसलों के खेतों मेंं धानी धानी सी हरियाली छाई है।

हवा के …………………………………………

…………….  🌦🌦🌦🌦 बरखा आई है।

बच्चों के किलकारीयों में कागज की नाव खूब मन को भाई है, बरखा आई है।

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इन्द्रधनुष के साथ सतरंगी खुशीयाँ लाई है,

बरखा आई है।।🌦🌦🌦🌦🌦🌦🌦

” स्मृति स्नेहा”🌤

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🌈”पहचान”🌈

मैं सब कुछ नहीं, पर कुछ तो हूँ।

सारा संसार ना सही पर खुद की पहचान तो हूँ। 🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟

सूरज की रोशनी तो नहीं, पर लौ का चिराग तो हूँ।

खिलखिलाती हँसी ना सही, पर एक मुस्कान तो हूँ। 🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟

बनते -बिगड़ते रिश्तों की समझ ना सही,

स्वाभिमान से जीने की हकदार तो हूँ।।

🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈

सुर ताल की लयबद्धता का ज्ञान तो नहीं,

शब्दों से गीतों की रचनाकार तो हूँ।।

🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈

“स्मृति स्नेहा”

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कुछ ख्वाब कुछ हकीकत….

इसके बावजूद के मैं कुछ ना हूँ….

इसके बावजूद के मैं कुछ ना हूँ,

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हर रोज ना जाने कितने ख्वाब देखती हूँ,

हँसती हूँ ,रोती हूँ, कुछ देर के लिए चुप बैठ जाती हूँ,

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कहानियां लिखने लग जाती हूँ,

खुद के मौजूद होने ना होने के द्वंद मेंं पड़ जाती हूँ।

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ना जाने क्यूँ लगता है मुझसे कोई सवाल कर बैठेगा,

खयालों की त्रिज्या पर  समकोण कोई तर्क कर बैठेगा।

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अब मैं सिर्फ और सिर्फ चारदीवारी की दुनिया को संजोने लग जाती हूँ,

मन मस्तिष्क को सीमित करने की कोशिश मेंं लग जाती  हूँ।

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चौंक जाती हूँ जब कभी सामने रखे पत्थर की लकीरों जैसी ही खुद को समझने लग जाती हूँ,

स्थूल ,स्थिर,अविरल नितांत पर शायद कुछ अधूरी सी।

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जैसे अभिव्यजनाओं से कहीं दूर कल्पनाओं में कहीं और कुछ भी नहीं,

स्वयं की पहेली मेंं जिंदगी की कड़ियों मेंं ना चाहते भी सबकुछ सीख जाती हूँ।

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कभी कभी लगता है एक यंत्र सी बन जाती हूँ,

जिसमें कुछ झंझावत् ध्वनियाँ सजीवता का एहसास करा रही हैं।

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और फिर से आखिरकार वक्त मिलते ही ,

ना जाने कितने ख्वाब देखने लग जाती हूँ।।

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“स्मृति स्नेहा”

वास्तविक रुप में सच को प्रस्तुत करने से बड़ी बात होती है किसी की मनोदशा किसी की भावनाओं को पढना। समाज मेंं आस पास ना जाने कितने प्रारूप दिखाई पड़ते हैं उन्हीं प्रारूप के श्रृंखला मेंं कुछ आस पासके दृश्यों का काव्यतम् स्वरूप औऱ कुछ सच को सच कहने का जज्बा,कविता को जीवंत बना देता है…..।

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फूलों के वादियों में…….

फूलों के वादियों में रहती हैं तितलीयाँ,

बहारों के रंग में ढ़लती हैं तितलीयाँ ,

इन प्यारी प्यारी आँखों के सपनों में

बसती हैं तितलीयाँ ।।🌈💠❤🌷

पलकों के झरोखों से कहानीयाँ भी

कहती हैं तितलीयाँ ।।🌈💠❤🌷

हर फूल हर ख्वाब हर रंग को ,

कैसे पढ़ती हैं तितलीयाँ ।।🌷🌷

बिना किसी दायरे में बँधे 🌷🌷

बड़ी दूर तलक खुश्बूएँ भी 🌷🌷

बिखेरती हैं तितलियाँ।🌈💠❤🌷

फूलों के वादियों में रहती हैं तितलीयाँ,

बहारों के रंग में ढ़लती हैं तितलीयाँ।।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷”स्मृति स्नेहा”

“ये तितलीयाँ….”🌹

फूलों के वादियों में रहती हैं तितलीयाँँ

बहारोंं के रंग में ढलती हैं तितलीयाँ।

इन प्यारी प्यारी आँखों के सपनों में

बसती हैं तितलीयाँ।

पलकों के झरोखों से कहानियां भी

कहती हैं ये तितलीयाँ।

हर फूल, हर ख्वाब,हर रंग को

कैसे पढती है तितलीयाँँ।

बिना किसी दायरे में बँधे बडी़ दूर तलक

खुशबूएँ भी बिखेरती हैं ये तितलीयाँ।

फूलों के वादियों में रहती हैं ये तितलीयाँ।।

“स्मृति स्नेहा”

मासूम सी मुस्कान

“मासूम सी मुस्कानोंं को इल्जाम भला कौन दे,

अब तो बेवजह मुस्कुराते हैंं हम,😊😊❄❄

लबों पे खिलती हँसी से खूबसूरत हुईंं हैं कायनातें,

अब तो गुलशनों की हर खुश्बू मेंं बस जाते हैं हम।।”

😊😊❄❄❄❄❄❄❄❄❄❄😊😊                                          ‘स्मृति स्नेहा’

मेरी आरजू

“मेरी हर एक आरजू ,मेरी जिंदगी ,मेरा ईमान हो।             🎼🎼🎶🎶🎼🎼🎶🎶🎶🎼🎼🎶

मेरी शक्लो सूरत में जानी पहचानी सी मुस्कान हो।

तुमसे ही जिंदगी है ,साँसों की रवानी।।                          🎼🎼🎶🎶🎶🎼🎼🎶🎶🎼🎼🎶

दिल कहता है मेरी आँखों के हर ख्वाब में

तुम ही तुम सुबह शाम हो।।”

🎼🎼🎶🎶🎶🎼🎼🎶🎶🎼🎼🎶                                                 ‘स्मृति स्नेहा’